खोखर जाट गोत्र का इतिहास / History of Khokhar Jat tribe

खोखर जाट गोत्र का इतिहास / History of Khokhar Jat tribe

गुप्तवंशज सम्राट् धारण गोत्र के जाट थे जिनका शासन भारतवर्ष पर 240 ई० से 528 ‍ई० तक रहा। अंधकार युगीन भारत पृ० 252 पर डा० काशीप्रसाद जायसवाल ने लिखा है कि गुप्त वंश के लोग कारसकर जाट थे।

कारसकर-कक्कड़-खोखर एक ही नाम के अपभ्रंश हैं। ये लोग उसी मूल समाज के प्रतिनिधि हैं जिस समाज में गुप्त लोग थे। कारसकरों में भी गुप्त लोग जिस गोत्र के थे उसका नाम धारण था। (अधिक जानकारी के लिये देखो, पंचम अध्याय, गुप्त साम्राज्य प्रकरण)।

 History of Khokhar Jat tribe
History of Khokhar Jat tribe

वायु पुराण व विष्णु पुराण में खोखरों का नाम कोकरकस लिखा है और विष्णु पुराण इंग्लिश पृ० 157-162 पर इनका नाम कोकर/खोखर लिखा है। ईरानी भाषा में खोखर को खिखर लिखा है और यूनानी भाषा में इनको गोगेरी (Gogiarei) लिखा है।

इससे यह अनुमान लगता है कि ये खोखर जाट ईरान तथा यूनान में रहे। खोखर जाटों का स्वभाव स्वतन्त्र रहने का है। ये दूसरों के अधीन रहना पसन्द नहीं करते, जिसके लिए समय-समय पर इन्होंने अनेक युद्ध किये। खोखर जाट बड़े युद्धवीर हैं। इनके कुछ युद्धों का वर्णन इस प्रकार से है –


  • 1. महमूद गजनवी ने अपना छठा आक्रमण सन् 1008 ई० में राजा आनन्दपाल पर किया। आनन्दपाल ने उज्जैनग्वालियर, कालिंजर, कन्नौजदिल्ली और अजमेर के राजाओं का संघ बनाया और आक्रमणकारी से युद्ध करने के लिए पंजाब की ओर बढ़ा। खोखर जाट भी इन हिन्दू सेनाओं में आकर मिल गये। महमूद को इससे पहले इतनी बड़ी सेना से सामना नहीं करना पड़ा था। 40 दिन तक दोनों पक्ष की सेनायें पेशावर के मैदान में आमने-सामने डटी रही थीं। महमूद ने अपने 6000 धनुर्धारियों को शत्रु पर आक्रमण करने के लिए आगे रखा। 30,000 खोखर जाटों ने एकदम मुसलमान सेना पर आक्रमण कर दिया और मार-काट शुरु कर दी। महमूद के धनुर्धारियों को खोखरों ने पीछे भगा दिया और शत्रु सेना में घुस पड़े तथा उन्होंने लगभग 5000 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। इस भीषण आक्रमण से घबराकर सुलतान महमूद युद्ध बन्द करने ही वाला था कि आनन्दपाल का हाथी डरकर युद्धभूमि से भाग खड़ा हुआ। यह देखकर हिन्दू सैनिक भयभीत हो गये और गजनवी की सेना ने दो दिन-रात तक उनका पीछा किया। अनेक मारे गये और महमूद विजेता को अपार धनराशि हाथ लगी। (मध्यकालीन भारत का संक्षिप्त इतिहास, पृष्ठ 53, लेखक ईश्वरीप्रसाद; तारीख हिन्दुस्तान, बाब 18, पृष्ठ 23)।
  • 2. महमूद गजनवी ने सन् 1025 में अपना 16वां आक्रमण सोमनाथ पर किया था। सोमनाथ के मन्दिर में अपार धन व सोना ऊंटों पर लादकर जब महमूद सिंध के रेगिस्तान में अपने देश गजनी को लौट रहा था तो मुलतान के समीपवासी खोखर जाटों ने सिंध के रेगिस्तान में आक्रमण करके उसकी सम्पूर्ण लूट का लगभग आधा भाग लूट लिया। महमूद घबरा गया। उसने अपने लश्कर को समेटा परन्तु खतरा दूर नहीं हुआ। उसे गजनी दूर लग रही थी। वह मन मारकर चलता बना और गजनी पहुंच गया। (जाटों का उत्कर्ष, पृ० 109, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री । (लेफ्टिनेंट रामस्वरूप जून, जाट इतिहास, पृ० 105; मध्यकालीन भारत का संक्षिप्त इतिहास, पृ० 57, लेखक ईश्वरीप्रसाद। तारीख हिन्दुस्तान, अध्याय 18, पृ० 27 पर यह लेखक लिखते हैं कि जाटों ने सिंध प्रदेश में महमूद का बहुत सा माल-असबाब आक्रमण करके लूट लिया)।
  • 3. जाटों की इस लूट से नाराज होकर महमूद ने बदला लेने के लिए जाटों पर अपना अन्तिम आक्रमण सन् 1025 में किया। यह युद्ध नावों में बैठकर दोनों ओर की सेनाओं में जेहलम नदी में हुआ। इस युद्ध में अन्य जाटों के साथ खोखर जाट भी वीरता से लड़े और उनका भारी नुकसान हुआ। इस युद्ध में जाट हार गए और महमूद विजयी रहा। (अधिक जानकारी के लिए देखो, षष्ठ अध्याय, महमूद गजनवी और जाट प्रकरण)।
  • 4. मुहम्मद गौरी ने सन् 1175 से 1206 ई० तक उत्तरी भारत पर कई आक्रमण किये। सन् 1178 में गौरी ने नेहरवाल (गुजरात) के राजा भीमदेव पर आक्रमण कर दिया। परन्तु शक्तिशाली राजा भीमदेव ने गौरी को करारी हार दी। गौरी वहां से जान बचाकर भाग आया। फिर गौरी ने पेशावर और समुद्र तट तक सिंध देश को जीत लिया। लाहौर न जीत सकने के कारण उसने खुसरो मलिक के साथ सन्धि कर ली और गजनी लौट आया।

उसके चले जाने के बाद खुसरो मलिक ने खोखर जाटों की सहायता से सियालकोट के दुर्ग पर घेरा डाल दिया। यह सूचना मिलते ही गौरी ने आकर लाहौर पर आक्रमण कर दिया और कूटनीति द्वारा सन् 1186 में खुसरो मलिक को जीत लिया तथा उसे मार दिया। इस प्रकार सुबुक्तगीन वंश का अंत कर दिया। (देखो षष्ट अध्याय, शहाबुद्दीन गौरी और जाट प्रकरण)।

  • 5. मुहम्मद गौरी ने सन् 1205 में मध्य एशिया पर आक्रमण कर दिया। वहां पर उसकी करारी हार हुई। इस हार के बाद प्रत्येक प्रदेश के राज्यपालों ने उसके विरुद्ध विद्रोह आरम्भ कर दिए। मुलतान पर एक नया शासक बन गया। खोखर जाटों ने लाहौर पर अधिकार कर लिया तथा पंजाब के शासक बनने की घोषणा कर दी। सन् 1205 ई० में खोखरों को दबाने के लिए गौरी फिर भारत आया। इसने इस विद्रोह को दबा दिया। परन्तु जब वह लाहौर से 15 मार्च 1205 ई० को गजनी वापिस जा रहा था तब धम्यक (Dhamyak) के स्थान पर मुलतान के 25,000 खोखर जाटों ने गौरी की सेना पर धावा बोलकर मुहम्मद गौरी का सिर काट लिया। उसके मरते ही गौरी का विशाल साम्राज्य ऐसा अस्त हो गया कि मानो वह जादू का चमत्कार था। गौरी के कोई पुत्र न था। उसके मरने के बाद उसकी इच्छा के अनुसार सन् 1206 ई० में उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक देहली साम्राज्य का बादशाह बना। (अधिक जानकारी के लिए देखो, षष्ठ अध्याय, खोखर जाटों का विद्रोह और गौरी की मृत्यु।)
  • 6. चंगेज खां ख्वारिज्म के अन्तिम शाह जलालुद्दीन पर आक्रमण किया तो वह भारत की ओर भाग गया। उसने सिंध नदी पर पड़ाव डाला और दिल्ली सल्तनत के बादशाह अल्तमश (सन् 1211-1236 ई०) से सहायता मांगी, परन्तु उसने इन्कार कर दिया। अन्त में 1221 ई० में जलालुद्दीन खां को चंगेज खां की सेना ने हरा दिया। कुछ सैनिकों को साथ लेकर उसने भागकर जान बचाई। उसने खोखर जाटों की सहायता से मुलतान के शासक नासिरुद्दीन कुबैचा पर आक्रमण किया और उसे मुलतान के दुर्ग में से भगा दिया। (अधिक जानकारी के लिए देखो, चतुर्थ अध्याय, चंगेज खां का आक्रमण)।
  • 7. जब 1246 ई० में नासिरुद्दीन दिल्ली की गद्दी पर बैठा तो बलबन को साम्राज्य का प्रधानमंत्री बना दिया गया। बलबन ने 1246 ई० में रावी नदी को पार किया और जूद तथा जेहलम पहाड़ियां रौंद डालीं। खोखर जाटों ने उसके साथ युद्ध किया परन्तु उसने खोखरों तथा अन्य उपद्रवी जातियों को दबा दिया। (मध्यकालीन भारत का संक्षिप्त इतिहास, पृ० 87, लेखक ईश्वरीप्रसाद); (तारीख हिन्दुस्तान, अध्याय 20वां पृ० 86)।
  • 8. फिरोज तुगलक के 6 उत्तराधिकारी हुये जो दुर्बल व डरपोक थे। उनमें तीसरा मुहम्मद द्वितीय था जिसकी सन् 1394 में मृत्यु हो गई। मुहम्मद के सबसे छोटे पुत्र शहजादा महमूद को सिंहासन मिला। वह नासिरुद्दीन महमूद तुगलक के नाम से राज्य करने लगा। उसके शासन काल में सारे देश में अव्यवस्था फैल गई और अपनी सीमाओं के भीतर जागीरदार और जमींदार एक तरह से पूर्ण रूप से स्वतन्त्र बन गये। उत्तर में खोखर जाटों ने विद्रोह कर दिया। (मध्यकालीन भारत का संक्षिप्त इतिहास, पृ० 159-160, लेखक ईश्वरीप्रसाद; तारीख हिन्दुस्तान उर्दू, अध्याय 22वां, पृ० 181)।
  • 9. तैमूरलंग ने भारत पर सन् 1398 ई० में 92,000 घुड़ासवारों के साथ आक्रमण कर दिया। उसने 24 सितम्बर 1398 को सिंध नदी पर कर ली और वहां से आगे जेहलम और रावी को पार करके तल्मबद शहर पर अधिकार कर लिया। इसके बाद खोखर जाटों ने उससे युद्ध किया परन्तु हार गये। (तारीख हिन्दुस्तान उर्दू, अध्याय 22वां, पृ० 189)।
  • 10. सैय्यद वंश के बादशाह खिजर खां की सन् 1421 ई० में मृत्यु होने पर मुबारिक शाह दिल्ली का बादशाह बना। खोखर जाट और हिन्दू सरदार उसके शासन के लिए आपत्ति का कारण बन गये। (तारीख हिन्दुस्तान उर्दू, अध्याय 23वां, पृ० 193)।
  • 11. शेरशाह (1540 ई० से 1555 ई०) ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार करने के पश्चात् कुछ और प्रदेशों को भी जीता। जब वह पंजाब में मुगलों का पीछा कर रहा था तो उसने गक्खड़ (खोखर) प्रदेश में रहने वाली अनेक युद्धप्रेमी और स्वतंत्र जातियों को अधीन करने का प्रयास किया। (भारत का इतिहास, पृ० 179, हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी)।
  • 12. मुबारिक शाह सैय्यद (सन् 1421-1434 ई०) के शासनकाल में दो प्रधान विद्रोह हुए। सन् 1428 ई० में जसरथ खोखर का विद्रोह हुआ और दूसरा सरहिन्द के निकट पौलाद तुर्क बच्चा का विद्रोह हुआ। (मध्यकालीन भारत का संक्षिप्त इतिहास, पृ० 209, लेखक ईश्वरीप्रसाद)।
  • 13. बाबर (सन् 1526 से 1530 ई०) अपनी सेना लेकर भारत पर चढ आया। पंजाब में भीरा, खुशाब और चनाब नदी के क्षेत्र में खोखर जाटों ने उससे कड़ी टक्कर ली। जाट इतिहास पृ० 17 पर कालिकारंजन कानूनगो ने लिखा है कि – बाबर को उसके मार्ग में नील-आब और भोरा के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले जाटों से पाला पड़ा जिनके सरदार गक्खर (खोखर) जाट थे (बाबर का इतिहास, पृ० 387, लेखक ए० एस० बेबरिज)। उनमें उनके प्राचीन लड़ाकू एवं लूटमार करने के गुण विद्यमान थे। बाबर लिखता है कि यदि कोई भारतवर्ष में प्रवेश करता है तो उसकी जाट और गुर्जर पहाड़ियों तथा मैदानों में बड़ी संख्या में एकत्र होकर लूटमार करते हैं।
  • 14. आधुनिक नगर रोहतक (हरयाणा) के उत्तर में खण्डहर पड़े हैं जिनको खोखराकोट कहा जाता है अर्थात् खोखरों का किला। इसकी खुदाई बहुत दिनों से चालू है, जिससे सिक्के तथा अनेक वस्तुएं निकली हैं। उनका अध्ययन करके स्वामी ओमानन्द जी आचार्य ने मुझे बताया है कि बहुत समय पहले इस स्थान पर खोखर जाटों का किला और शासन था। उन्हीं के नाम पर यह स्थान खोखराकोट कहलाता है। 
खोखर जाट गोत्र का इतिहास
खोखर जाट गोत्र का इतिहास

खोखर जाट गोत्र का इतिहास / History of Khokhar Jat tribe

खोखर जाटों के गांव – जिला रोहतक में कंसाला, जिला सोनीपत में शामड़ी, जिला जीन्द में धिमाणा गांव में कुछ घर हैं। कंसाला गांव से खोखर जाट जाकर जिला मेरठ, तहसील बागपत में आबाद हो गये। वहां पर इस गोत्र के गांव छपरोलीबदरकारठोड़ाहलालपुरमुकन्दपुर और तलवाड़ा हैं।

छपरोली खाप का बाहरा है जिसमें 6 अन्य गोत्र के गांव हैं। जिला मथुरा और अलीगढ़ में खोखर जाटों के 52 गांव हैं। जिला मुरादाबाद में 24 गांव इनके हैं।

पंजाब में जिला भटिण्डा में मानसा मण्डी के आस-पास 150 गांव खोखर जाट-सिक्खों के हैं। जिला संगरूर में जाखल के निकट खोखर रेलवे स्टेशन है।

 पाकिस्तान में गुजरात से अटक तक खोखर जाटों की काफी संख्या है जो कि इस्लाम धर्मी हैं। इसी तरह सिंध और बलोचिस्तान में खोखर जाट बड़ी संख्या में आबाद हैं। बलोचिस्तान में खोखरों की काकड़जई नामक बहुत बड़ी खाप है।

सिंध और बलोचिस्तान के जाट मुसलमान जिनमें खोखर जाट अधिक हैं, आज भी पाकिस्तान सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर बैठते हैं। इन जाटों में स्वतन्त्र रहने की विशेषता आज भी विद्यमान है।

चौधरी रियाज़ हुसैन खोखर जून 2002 से फरवरी 2005 तक पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव हैं, जब उनकी जगह रियाज़ मोहम्मद खान ने ली थी।

खोखर ने पाकिस्तान के विदेश सचिव के रूप में विदेश मंत्रालय के शीर्ष पद का नेतृत्व करने से पहले भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन में पाकिस्तान के राजदूत के रूप में भी कार्य किया।

History of Khokhar Jat tribe

लगभग 230 इ.पू. महान् सिकन्दर की वापसी पर व्यास नदी पार करते समय खोखर जाटों ने उसे घायल किया, जो बेबीलोन में मर गया। इसकी फौज को वहाँ जाटों ने खूब लूटा। लेकिन इतिहास को तोड़मरोड़कर पेश किया गया तथा खोखर जाटों को एक जाति लिख दिया, जबकि संसार में कोई भी खोखर जाति नहीं।

इसी प्रकार हमारे मंड या मेड गोत्र को भी इतिहास में जाति लिखा है। यह गोत्र सिख तथा मुस्लिम धर्मी जाटों में अधिक है। ये तो जाटों के बहादुर, लड़ाकू तथा शासक गोत्र रहे हैं, जिस गोत्र के यूरोप में ईसाई जाट, मध्य एशिया तथा पाकिस्तान में मुस्लिम जाट और भारत में हिन्दू व सिक्ख जाट हैं।

भारत में पाकिस्तान के भूतपूर्व राजदूत श्री रियाज खोखर इसी गोत्र के मुसलमान जाट हैं। इसी प्रकार पृथ्वीराज चौहान के हत्यारे मुहम्मद गौरी, जिसे शाहबुद्दीन गौरी भी कहा जाता है, लाहौर के पास रामलाल खोखर नाम के वीर जाट योद्धा ने दिनांक 15 मार्च सन् 1206 को अपनी तलवार से उसका सिर कलम कर दिया। जिस पर उसकी सेना में भगदड़ मची, जिसको जाटों ने जी भरकर लूटकर दरबदर कर दिया।

Randhir Singh

I am Randhir Deswal From Rohtak Haryana. I am a writer and a history student.

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5 Responses

  1. 07/08/2020

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  2. 30/08/2020

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  3. 31/08/2020

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  4. 02/09/2020

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  5. 02/11/2020

    […] काकड़जई खाप तीसरी सबसे बड़ी शक्ति हैं। खोखर जाट इतिहास अगले पृष्ठों में दिया […]

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