पंचायत और इसके जन्मदाता जाट थे

पंचायत और इसके जन्मदाता जाट थे

पंचायत और इसके जन्मदाता जाट थे

संसार के पंचों के पंच और उनके सरपंच जाट रहे।
पंचायत व प्रजातन्त्र के आदि-जनक भी जाट रहे॥’

यह बात किसी भी सच्चाई की कसौटी पर खरी उतरती है और संसार में बिखरे जाटों के इतिहास से यह प्रमाणित है कि पंचायत प्रणाली जाटों की अपनी एक सोच, विचारधारा तथा इनकी अपनी एक पद्धति रही है।

डा. एम.सी. प्रधान ने भी अपने शोध में माना है कि जाटों जैसी पंचायती पद्धति संसार में और कहीं नहीं रही। इसलिए प्राचीन भारत में जगह-जगह जाटों के पंचायती राज रहे। जिसे यौधेय राज भी कहा जाता है।

इसी पंचायती प्रणाली से आज के प्रजातंत्र का यूरोप में जन्म हुआ, जिसके पीछे वहाँ जाटों का, विशेषकर मोर जाटों का भारी योगदान रहा है। जिन्हें वहाँ आज ‘मूर’ नाम से जाना जाता है।

सन् 1947 तक जाटों की रियासतें

पंचायत और इसके जन्मदाता जाट थे

पंचायत और इसके जन्मदाता जाट थे

भारत में भी जाटों के राज हमेशा परोक्ष रूप से प्रजातांत्रिक राज थे, जिस बारे में विदेशी इतिहासकारों ने भी बार-बार टिप्पणियाँ लिखी हैं।

महाराजा हर्षवर्धन का राज तो लगभग पूर्ण ही एक प्रजातांत्रिक राज था जहाँ राज के फैसले पंचायतों में लिये जाते थे। इसके अतिरिक्त ‘सर्वखाप पंचायत’ तथा इसका रिकार्ड स्वयं में एक प्रमाणित अध्याय है

जिसमें इस पंचायत के पास अपराधी को दण्ड देने तथा अपनी सेना रखने तक का अपना अधिकार था, जिसका लिखित रूप में 7वीं सदी से सम्पूर्ण इतिहास उपलब्ध है।

जाट कौम में गोत्र विवाद – जायज या नाजायज?

भारत के प्राचीनकाल में यौधेय गणतन्त्र तो प्रमुख रहे हैं, जो एक तरह से प्रजातान्त्रिक राज थे, जो अधिकतर जाटों के थे। उस समय तक यूरोप के प्रजातन्त्र का जन्म नहीं हुआ था,

लेकिन बीच में फिर से भारत में ब्राह्मणवाद की वजह से एकतन्त्र का जन्म हो गया था।

प्रख्यात विद्वान् तथा पत्रकार व लेखक सरदार खुशवन्त सिंह ने सिक्ख इतिहास में बड़ा जोर देकर लिखा है – पंचायत संस्था और प्रणाली जाटों की

देन है। जाटों का हर गांव एक छोटे गणतन्त्र के समान है। पौराणिक ब्राह्मणवाद पंचायतों व प्रजातंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन रहा जो हमेशा अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए पुरोहितवाद की कुर्सी ढूंढ़ता रहा।

प्रजातंत्र की जननी पंचायत और इसके जन्मदाता जाट थे

इसी कारण जाट और राजपूत अलग करवाये तथा इन्होंने राजपूतों के रजवाड़ों में पनाह लेकर सलाहकार की भूमिका निभाई।

जिन्होंने ब्राह्मणवाद की सलाह मानी वे राजपूत कहलाये और न माननेवाले जाट के जाट रह गये। लेकिन जाटों की इन प्राचीन संस्थाओं को मुगल और अंग्रेज भी कभी न छू पाए थे। आज भारत सरकार ने हमला बोल दिया है।

(विद्वान् लार्ड ब्रेसी, विद्वान् हरबर्ट मैरीसन तथा “Democratic Civilization” by L. Lipsen, ‘पंचायती इतिहास’, ‘जाटों का उत्तरी भारत में पंचायती प्रशासन तथा सर्वखाप पंचायत का राष्ट्रीय पराक्रम’, ‘सिक्ख इतिहास’ आदि आदि) ।

मल्लयुद्ध (कुश्ती) जाटों का अपना खेल

अड़ कुटिल कुलिस-सा प्रबल प्रखर अंग्रेजों की छाती में गढ़,
सर-गढ़ से बढ़-चढ़ सुदृढ़, यह अजय भरतपुर लोहगढ़।

यह दुर्ग भरतपुर अजय खड़ा भारत माँ का अभिमान लिए,
बलिवेदी पर बलिदान लिए, शूरों की सच्ची शान लिए ॥

पूरा जोधड़, उदैपुर, जैपुर, पहूँ थारा खूटा परियाणा।
कायरता से गई आवसी नहीं बाकें आसल किया बखाणा ॥

बजियाँ भलो भरतपुर वालो, गाजै गरज धरज नभ भौम।
पैलां सिर साहब रो पडि़यो, भड उभै नह दीन्हीं भौम ॥

जाट महापुरुषों की लिस्ट

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