भारतवर्ष की गुलामी के संस्थापक कौन थे?

भारतवर्ष की गुलामी के संस्थापक कौन थे?

भारतवर्ष की गुलामी के संस्थापक कौन थे

भारत को गुलाम किसने किया? जब से हमने होश संभाला और पढ़ना शुरू किया तो हमें यही पढ़ाया जाता रहा कि हमारा देश 1000 साल तक आपसी फूट के कारण गुलाम रहा।

लेकिन हमारे सरकारी इतिहासकारों ने इस तथ्य को कभी उजागर नहीं किया कि यह आपसी फूट डालनेवाले लोग कौन थे? इन्होंने कैसे फूट डाली? इतिहास गवाह है कि मामला फूट का नहीं था। ये गद्दारियों से भरा इतिहास है

जिसने इस देश को कमजोर किया और यही कारण है कि देश 1000 साल तक गुलामी की बेडि़यों में जकड़कर अपनी किस्मत पर आंसू बहाता रहा।

भारतवर्ष की गुलामी के संस्थापक कौन थे?

भारतवर्ष की गुलामी के संस्थापक कौन थे

यह सिलसिला आजादी के बाद भी नहीं रुका और एक दूसरे रूप में हमारे सामने आया। हमारा देश ‘परमाणु बम्ब’ बनाकर तथा दर्जनों राकेट आसमान में छोड़कर भी आज नैतिक पतन व भ्रष्टाचार के कारण औंधे मुंह पड़ा है

क्यों और कैसे? इसके पीछे भी हमारा एक शर्मनाक इतिहास हमारे संस्कारों का दुश्मन बना बैठा है। उदाहरण के लिए यहाँ कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया जाता है –

(1) अशोक महान् के नाम से हम सभी परिचित हैं। यह मोर गोत्र का बौद्धधर्मी जाट राजा था जिसका लगभग समस्त भारत पर अधिकार था तथा उस समय भी यह भारत वर्ष एक देश था। याद रहे इसके राज में संस्कृत भाषा का कोई भी चलन नहीं था।

इनके बाद इनका पुत्र बृहद्रथ राजगद्दी पर बैठा तो उसके ही विश्वासपात्र ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र ने धोखे से उसकी हत्या करवा दी और सत्ता हथिया ली।

लेकिन ये पुष्यमित्र ब्राह्मण पूरे भारत वर्ष को इकट्ठा रखने में पूर्णतया असफल रहा क्योंकि उसने अपने शासन में धर्म के नाम पर असमानता के बीज बोये जिस कारण अशोक महान् का महान् भारत वर्ष छिन्न-भिन्न हो गया।

कुछ रही सही कमी ब्राह्मण शशांक ने जाट बौद्धों के मठ तुड़वा कर पूरी कर दी थी। यह ब्राह्मणवाद की भारतवर्ष की गुलामी के लिए पहली चकबन्दी थी।

इसी पौराणिक ब्राह्मणवाद ने सम्राट् मोर को शूद्र लिख दिया ताकि जाट और दलित आपस में उलझते रहें। यही छत्रपति शिवाजी के साथ हो रहा है।

मैंने स्वयं बहुजन समाज पार्टी के भाषणों में लोगों को कहते सुना है कि ढाई हजार वर्ष पहले उनका अपना राज था।

भारतवर्ष की गुलामी के संस्थापक कौन थे

इनका कहने का अर्थ है कि पूरा मौर्यवंश ही शूद्र था। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि उस समय का चाणक्य ब्राह्मण कैसे एक शूद्र वंशीय चन्द्रगुप्त मौर्य को राज दिला सकता था और उनके आधीन मंत्री रह सकता था?

ये कभी भी उस काल में संभव नहीं था और न ही ऐसा उस समय सोचा जा सकता था। नहीं तो वे अपनी जाति के दलित लोगों को क्यों गांव से बाहर एक कोने में फैंकते जो चाणक्य के कहने पर ही हुआ था।

इसी प्रकार यह लोग अपनी पार्टी के मंचों पर छत्रपति शिवाजी को शूद्र मानकर उनका चित्र लगाते हैं। क्योंकि ब्राह्मणों ने उनको शूद्र लिखा। जबकि प्रमाण स्पष्ट हैं कि वे बलवंशी जाट थे।

इस देश में जब से वर्ण व्यवस्था प्रचलित हुई और स्थायी हुई तब से लेकर सन् 1947 तक शूद्र वंश से न कभी कोई राजा बना और न कभी कोई राज वंश चला। अफसोस है कि जाट कौम इन महापुरुषों को शूद्र लिखने पर पीछे हट गई और अपने ही जाट महापुरुषों को नहीं अपनाया।

व्यवस्था प्रचलित हुई और स्थायी हुई तब से लेकर सन् 1947 तक शूद्र वंश से न कभी कोई राजा बना और न कभी कोई राज वंश चला। अफसोस है कि जाट कौम इन महापुरुषों को शूद्र लिखने पर पीछे हट गई और अपने ही जाट महापुरुषों को नहीं अपनाया।

भारतवर्ष की गुलामी के संस्थापक कौन थे

जाट इतिहास व जाट शासन की विशेषतायें

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