धनखड़ जाट गोत्र – Dhankhar Jat Gotra History

धनखड़ जाट गोत्र – Dhankhar Jat Gotra

गुप्त सम्राट धारण गोत्र के जाट थे जिनका प्रशासन भारतवर्ष में 240 ई० से 528 ई० तक लगभग 300 वर्ष रहा था। इनके शासनकाल को स्वर्ण-युग कहते हैं।

इसी तरह धारण वंश में एक प्रसिद्ध योद्धा धनया नामक हुआ जिसकी वीरता व प्रसिद्धि के कारण उसके साथ धारण जाटों का संघ (दल) उसके नाम पर धनखड़ गोत्र कहलाया।

अतः धनखड़ गोत्र धारण गोत्र की शाखा है। सबसे पहले इस धनखड़ दल ने वन काटकर मोरवाला बसाया जो कि तहसील व जिला दादरी में है। यहां से जाकर इनके 52 खेड़े (गांव) बसे हुये हैं।

धनखड़ जाटों के कुछ गांवों के नाम ये हैं –

  • तहसील दादरी में मोरवाला,
  • जिला झज्जर में ढाकला, कासनी, फतहपुर माजरा (खुडन), ग्वालीसन, कलोई (सूहरा),
  • रोहतक में छुडानी, करौंथा, शिमली, हुमायूंपुर, बखेता, गोला में 80 घर, झज्जर में 70 घर,
  • जिला सोनीपत में खूबड़ू, गढी, गांवड़ा, नयाबास
  • जिला रेवाड़ी में बुड़ौली आदि गांव धनखड़ जाटों के हैं।
  • भरतपुर में बकड़ौली,
  • जिला मेरठ में बिहारी,
  • बिजनौर में फतेहपुर, मंगोलपुर, इस्लाम नगर, काफियाबाद,
  • जिला मुरादाबाद में सालामतपुर आदि धनखड़ जाटों के प्रसिद्ध गांव हैं।

भाषा भेद के कारण इनका नाम धनखड़-धनकड़-धनकर, धनोए बोला जाता है। जिला बरेली में दुपहरिया गांव धनोए जाटों का है।

फौजी रिपोर्ट के अनुसार जिला अमृतसर में 1500 और पटियाला में 1300 धनोए जाट हैं। एयर मार्शल बीरेंद्र सिंह धनोआ से ताल्लुक रखने वाले सिख जाट हैं।

Dhankhar Jat Gotra
धनखड़ जाट गोत्र

जिला झुंझनूं (राजस्थान) में नयाबास गांव धनखड़ जाटों का है।

इस धनखड़ जाट गोत्र में दो प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हैं जिनका विवरण इस प्रकार से हैं:

  • परम सन्त स्वामी गरीबदास महाराज,
  • रिसलदार बदलूराम विक्टोरिया क्रॉस।

परम सन्त स्वामी गरीबदास महाराज (1717-1788)

जन्म – चौ० शिवलाल गांव छुड़ानी जिला रोहतक के निवासी थे जो विशाल सम्पत्ति के मालिक थे। उनकी रानी नामक केवल एक ही लड़की थी जिसका विवाह रोहतक के गांव करौंथा के चौ० हरदेवसिंह धनखड़ के पुत्र बलराम से हुआ था।

चौ० शिवलाल के कोई पुत्र नहीं था इसलिए उसने अपने दामाद बलराम को अपने घर रख लिया। बलराम अपनी स्त्री रानी व परिवार सहित अपने गांव करौंथा से जाकर छुड़ानी गांव में चौ० शिवलाल के घर चला गया

12 वर्ष के बाद चौ० बलराम धनखड़ के घर वैशाख पूर्णिमा के दिन वि० संवत् 1774 (सन् 1717 ई०) में रानी के गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ। उस बालक का नाम गरीबदास रखा गया। बाल्यावस्था में ही इन्हें वैराग्य हो गया था।

ईश्वरभक्ति, स्पष्टवादिता, निर्भीकता के लिए आप बहुत शीघ्र प्रसिद्धि को प्राप्त हुए। इन्होंने हरयाणा में आध्यात्मिकता का और उच्च सिद्धान्तों का बड़ा प्रचार किया। ये योगी और सिद्ध महात्मा के रूप में विख्यात हुए।

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मुगल सम्राट् मुहम्मदशाह रंगीला (1719-1748) ने एक बार महात्मा गरीबदास को आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए दिल्ली दरबार में सादर आमन्त्रित किया तो आपने बादशाह को तीन बातें समझाईं –

  1. अन्य धर्मियों पर अत्याचार बन्द करो।
  2. किसानों के अन्न पर टैक्स बन्द करो व अकालग्रस्तों के लगान में छूट दो।

तीनों बातें शाह ने मान लीं तो आपने आशीर्वाद दिया – जो कोई माने शब्द हमारा, राज करे काबुल कन्धारा। परन्तु मुल्लाओं ने यह कहकर कि काफिर का कहा मानना नापाक हो जाना है शाह को यह तीनों बातें मानने से रोक दिया।

बन्दी बना लेने तक का षड्यन्त्र जब महात्मा गरीबदास को ज्ञात हुआ तो पांच सेवकों सहित चुपचाप ये दिल्ली से आ गए। चलते समय यह शाप दे आये –

दिल्ली मण्डल पाप की भूमा
धरती नाल जगाऊं सूमा।

(दिल्ली पाप की भूमि बन गई और यहां पर शत्रुओं के घोड़ों के खुरों की खूब धूल उड़कर रहेगी)।

यही हुआ, अगले ही वर्ष सन् 1739 ई० में नादिरशाह के आक्रमण ने दिल्ली को रौंद डाला, दिल्ली की जनता को मौत के घाट उतार दिया, शाही खजाने को तथा नागरिकों की सम्पत्ति को लूटकर ले गया। दिल्ली साम्राज्य फिर उभर न सका।

धनखड़ जाट गोत्र – Dhankhar Jat Gotra

धनखड़
धनखड़

सन्त गरीबदास, सन्त कबीर के सिद्धान्तों के अनुयायी थे। वे ग्रामीणों को उपदेश करते थे

गरीब गाड़ी बाहो घर रहो, खेती करो खुशहाल।
साईं सिर पर रखिये तो सही भक्ति हरलाल ॥

दास गरीबा कहे दर्वेशा, रोटी बांटो सदा हमेशा। इस तरह के अनेक उपदेशों से हरयाणावासी आपसे हमेशा स्नेह करने लगे। आपकी भाषा सरल हिन्दी होती थी परन्तु गहरे रूप से प्रभावोत्पादक थी।

इस तरह की आपकी 12000 वाणियों का विशाल संग्रह गरीबग्रंथ के नाम से प्रसिद्ध है, जिसे रत्न सागर भी कहते हैं। श्री 1008 स्वामी गरीबदास के नाम से गरीबदासी एक पंथ चल पड़ा। मगर उनका अलग धर्म चलाने का कोई इरादा नहीं था।

उनके उपदेशों में ईश्वर-भक्ति कबीर से अधिक बढ़ी-चढ़ी थी। इस पंथ की विशेष मुक्तिपुरी श्री छुड़ानी धाम मानी जाती है। दिल्ली, हरद्वार, ऋषिकेश, काशी आदि सभी तीर्थ स्थानों में इस पंथ के मठ तथा कुटियां बनी हुई हैं।

हरयाणा, यू.पी., पंजाब हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और गुजरात में श्री गरीबदास के नाम पर लगभग 110 आश्रम हैं जहां पर आपके अनुयायी आपके उपदेश सुनाते हैं।

सन्त गरीबदास का विवाह चौ० नादरसिंह दहिया, गांव बरौना जिला सोनीपत की पुत्री मोहिनी से हुआ था। उनके चार पुत्र जैतराम, तुरतीराम, अंगदराम और आसाराम और दो पुत्रियां दिलकौर और ज्ञानकौर ने जन्म लिया।

Dhankhar Jat Gotra
Dhankhar Jat Gotra

इनमें जैतराम जी के जब जगन्नाथ पुत्र हुआ तब वह गृहस्थ छोड़कर नागा साधु हो गये। करौंथा ग्राम निवासियों के आग्रह पर जैतराम जी करौंथा गांव में रहने लग गये।

कुछ ही समय पश्चात् इनका सन् 1880 में महन्तपुर जि० जालन्धर में देहान्त हो गया। वहां आपकी छतरी बनी हुई है। गांव करौंथा में भी आपकी अस्थियां लाकर उन पर

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-1011

छतरी बनाई गई। सन्त गरीबदास के दूसरे पुत्र तुरतीराम छुडानी की गद्दी पर बैठे जो 40 वर्ष तक विराजमान रहे। संवत् 1774 (सन् 1817) में आपका स्वर्गवास हो गया। स्वामी गरीबदास की दोनों पुत्रियां पूरी आयु कुंआरी रहकर ईश्वरभक्ति करती रहीं।

महन्त तुरतीराम जी के पुत्र महन्त दानीराम जी संवत् 1874 में इस गद्दी पर बैठे और 13 वर्ष तक रहकर संवत् 1887 (सन् 1830) में स्वर्गवासी हुए। आपके बड़े पुत्र शीलवन्त उपनाम श्रीराम जी इस गद्दी के महन्त हुए जो 43 वर्ष तक रहकर संवत् 1930 (सन् 1873) में स्वर्गवासी हुए।

आपके बड़े पुत्र शिवदयाल जी इस गद्दी के महन्त हुए। आपके कोई सन्तान न थी इसलिए आपने अपने भाई केशो जी के पोते सन्तोषराम के बेटे रामकृष्णदास जी को संवत् 1954 (सन् 1897) में गोद ले लिया। इसके बाद आप और 10 वर्ष तक जीवित रहकर संवत् 1964 (सन् 1907) में स्वर्ग सिधार गये।

इनके पश्चात् महन्त रामकृष्णदास जी संवत् 1964 में इस गद्दी पर बैठे। आपके दो पुत्र हैं – 1. गंगासागर का जन्म 1990 वि० (सन् 1933) में हुआ। 2. दूसरा पुत्र दयासागर है।

श्री गंगासागर जी छुडानी धाम के महन्त रहे परन्तु आपने गद्दी त्याग दी जिसके बाद महन्त दयासागर इस गद्दी पर विराजमान हैं। आपने अपने उत्तराधिकारी के रूप में अनुज कमलसागर का तिलक कर दिया है।

छुडानी धाम में आजकल एक बहुत बड़ा गुरुद्वारा तथा स्वामी गरीबदास जी की छतरी देखने योग्य है। स्वामी गरीबदास जी के भाई-बहन के परिवार के छुड़ानी गांव में 60 घर हैं जिनको साध कहते हैं।

रिसलदार बदलूराम धनखड़ विक्टोरिया क्रास (मरणोपरान्त)

धनखड़
धनखड़

रिसलदार बदलूराम धनखड़ गोत्र के जाट थे जिनका गांव ढाकला जिला रोहतक है। प्रथम महायुद्ध में आप 29 लॉन्सर (14 नं०) रिसाला में थे जो इस युद्ध में मध्यपूर्व में लड़ रहा था। आपको वहां 29 लॉन्सर में लगा दिया गया।

13 सितम्बर 1918 को आपके स्कॉड्रन (Squadron) ने जोर्डन नदी के पश्चिमी किनारे पर शत्रु के शक्तिशाली मोर्चे पर धावा कर दिया।

जब आप शत्रु के मोर्चे के निकट पहुंचे तो आपके स्कॉड्रन पर बायें ओर की एक छोटी पहाड़ी पर से, जहां शत्रु के 200 सैनिकों का मोर्चा था, सख्त फायर करने लगा।

इस गोलाबारी से आपके जवान मरने तथा घायल होने लगे। यह देखकर रिसलदार बदलूराम ने अपने साथ 6 जवान लेकर, खतरे की परवाह न करते हुए, वीरता से झपटकर शत्रु के उस मोर्चे पर धावा बोल दिया तथा वहां पर अपना अधिकार कर लिया।

जब आपने शत्रु की एक मशीनगन को जा पकड़ा तब आप प्राणघातक घायल हो गये जिससे आप वहीं वीरगति को प्राप्त हुए। किन्तु आपके मरने से पहले शत्रु ने आत्मसमर्पण कर दिया था।

आपकी यह महान् वीरता थी जिसके लिए ब्रिटिश सरकार ने आपको सर्वोच्च पदक विक्टोरिया क्रॉस (मरणोपरान्त) से सम्मानित किया।

आप भारतीय सेना में सबसे पहले विक्टोरिया क्रॉस पदक प्राप्त करने वाले वीर योद्धा हैं। जाट जाति को आप पर बड़ा गौरव है।

मास्टर बलदेव सिंह धनखड़

Dhankhar Jat Gotra
Dhankhar Jat Gotra

बलदेव सिंह धनखड़ (जन्म 4 मार्च 1889- मृत्यु 1976) ग्राम हमायुपुर जिला रोहतक हरियाणा में रोहतक में जाट स्कूल शुरू करने वाले पहले व्यक्ति थे। वह बाद में बड़ी संख्या में शैक्षणिक संस्थानों को शुरू करने के लिए एक साधन था।

वह एक भारतीय राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी – विधान परिषद के सदस्य (MLC) – विधान सभा के सदस्य (MLA) – हरियाणा में शिक्षा के अग्रणी – उत्तर भारत में जाट शैक्षिक समितियों के संस्थापक – आर्थिक उत्थान में विश्वास।

1913 में रोहतक में उनके तत्वावधान में जाट एसोसिएशन की स्थापना हुई। उनसे जीवन में एक बहुत बड़ी गलती हुई जो उन्होंने गाँधी जी और लाला लाजपत राय के बहकावे में आकर दीनबंधु सर चौधरी छोटूराम के खिलाफ अभियान छेड़ा।

इस वजह से सर छोटूराम को अलग से जाट हीरो मैमोरियल कॉलेज की स्थापना करनी पड़ी। समय के साथ मास्टर बलदेव का स्कुल बंद होने की कगार पर चला गया और सभी जाट छात्र सर छोटूराम के साथ खड़े हो गए।

अंत में गाँधी जी ने भी मास्टर बलदेव राम धनखड़ को अछूत मानकर किनारा कर लिया इसके बाद लाला लाजपत भी उन्हें धोखा दे गए। मास्टर बलदेव अब न घर के रहे ना घाट के।

अब मास्टर बलदेव धनकड़ को गलती का अहसास हुआ और वो रहबरे आजम चौधरी छोटूराम के पास गए। दीनबंधु ने उन्हें गले लगाया और उनके स्कुल को जाट हीरो मेमोरियल कालेज में विलय कर दिया गया।

Jat Muslim traditions in Pakistan

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