हुड्डा जाट गोत्र का इतिहास

हुड्डा जाट गोत्र का इतिहास

हुड्डा जाट गोत्र का इतिहास

यह प्रसिद्ध जाट गोत्र है जो वत्स जाट गोत्र की शाखा चौहान जाटों का वंशज गोत्र है। इनके विषय में किसी इतिहासकार ने इनको चौहान राजपूतों के वंशज लिखा है, तो यह बात असत्य, प्रमाणशून्य तथा बेबुनियाद है।

चौहान जाट गोत्र तो राजपूत संघ, जो कि सातवीं शताब्दी में स्थापित हुआ, से बहुत समय पहले का है। वे चौहान जाट जो राजपूत संघ में मिल गये, चौहान राजपूत कहलाये और जो न मिले वे चौहान जाट आज भी है।

इनकी उत्पत्ति का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है – वत्स या बत्स गोत्र के जाट महाभारत युद्ध में पांडवों की ओर होकर लड़े थे। महाभारत के बाद इन जाटों का राज्य पंजाब में भटिण्डा क्षेत्र पर रहा जिनका राजा उदयन था। फिर इनका राज्य उज्जैन में भी रहा।

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हुड्डा जाट गोत्र का इतिहास – History of Hooda Jat gotra

इसी गोत्र के प्रसिद्ध वीर योद्धा आल्हा, उदल और मलखान थे। (देखो तृतीय अध्याय, बत्स/वत्स प्रकरण)।

इसी वत्स जाट गोत्र के वंशज चौहान जाट हैं (देखो जाटों का उत्कर्ष, पृ० 375, वत्स चौहान प्रकरण, भारत में जाट राज्य उर्दू, पृ० 416-417, हूडा चौहान या हाडा प्रकरण, दोनों पुस्तकों के लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री)।

इन्हीं चौहान जाटों में हाडाराव वीर योद्धा हुए। ऐतिहासिक मिश्रबन्धु और मि० रेऊ, टॉड राजस्थान और हीराचन्द ओझा के लेखानुसार इसी हाडाराव के वंशज हाडा कहलाये।

भाषा भेद से इन हाडा जाटों को हूडा-हुड्डा नाम से कहा जाने लगा। राजपूत संघ स्थापित होने के कई

शताब्दी बाद कोटा और बूंदी रियासतों पर राजपूत हाडा चौहानों का राज्य रहा। उस क्षेत्र या प्रदेश का नाम हाडौती पड़ गया। इस क्षेत्र से हूडा जाट हरयाणा के रोहतक जिले में आकर आबाद हो गये।

यहां पर हूडा जाटों के 36 गांवों की हूडा खाप है जिसका प्रधान गांव खिडवाली है। खिडवाली के चारों तरफ इनके 12 गांव हैं और किलोई के आसपास इनके 12 गांव हैं।

इस गोत्र के जाट पंजाब में बहुत हैं जिनको हुड्डा कहा जाता है। जिला अमृतसर में बुढाला गांव, कोटली, सांगोदाद, मेन्दीपुर और जिला जालन्धर में बुटाला, जडिया गांव हुड्डा जाटों के हैं।

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हुड्डा जाट गोत्र का इतिहास – History of Hooda Jat gotra

हुड्डा खाप के गांव निम्नलिखित हैं –

  1. खिडवाली*
  2. कटवाड़ा*
  3. चमारिया*
  4. सिसरोली
  5. जीन्दराण*
  6. घुसकानी*
  7. सांघी*
  8. जसैया*
  9. बसंतपुर
  10. बाहमनवास
  11. मकड़ौली कलां
  12. मकड़ौली खुर्द
  13. किलोई खास*
  14. किलोई दोपाना*
  15. रुड़की*
  16. पोलंगी*
  17. मुंगान*
  18. धामड़*
  19. आसन*
  20. कनसाला
  21. हुमायूंपुर
  22. बखेता
  23. लाढौत
  24. भैयापुर
  25. मोई हुड्डा
  26. फरमाना
  27. माजरा फरमाना
  28. रिढाऊ
  29. मोजनगर
  30. महीपुर
  31. माजरा (जस्सुवाला)
  32. गुहना
  33. रिठाल
  34. काहनी
  35. घिलोड़ कलां
  36. घिलोड़ खुर्द ।

नोट – * चिन्ह वाले गांव हुड्डा गोत्र के हैं जिनमें जसिया 1/2 हुड्डा गोत्र का है। शेष गांव अन्य गोत्रों के हैं।

चौ० टेकराम हूडा की वीरता

चौ० टेकराम हूडा का जन्म खिडवाली गांव (जि० रोहतक) में हुआ था। आपके पिताजी का नाम चौ० रामजीलाल हूडा था। आप एक निडर योद्धा, साहसी, हिन्दूधर्म के रक्षक तथा गोमाता के सच्चे सेवक एवं रक्षक थे। चौ० टेकराम की महानता इस कारण है

कि आपने वह कार्य पूरा किया जो ईश्वर का आदेश है कि – हे राजपुरुषो! जैसे सूर्य मेघ को मार और उसको भूमि में गिरा सब प्राणियों को प्रसन्न करता है वैसे ही गौओं के मारने वाले को मार गौ आदि पशुओं को निरन्तर सुखी करो।

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हुड्डा जाट गोत्र का इतिहास – History of Hooda Jat gotra

ईश्वर के इस आदेश का पालन करने के चौ टेकराम के अनेक उदाहरण हैं जिनमें से कुछ का ब्यौरा निम्न प्रकार है –

  1. एक बार रोहतक शहर के मुसलमान कसाई ईद पर्व के दिन एक गाय को सजा-धजा कर उसे काटने के लिए बूचड़खाने में ले जा रहे थे। पता लगने पर वीर टेकराम हूडा उचित समय पर कसाइयों की गली में पहुंच गया।

गाय को साथ ले जाने वालों पर वीर योद्धा टेकराम ने शेर की तरह झपटकर उनको मारना शुरु कर दिया। इनकी मार से दो-तिहाई मर गए और कई घायल हो गये। शेष गाय को छोड़कर भाग खड़े हुए।

उस वीर ने अपने एक साथी को, जो कि कुछ दूरी पर खड़ा था, इस गाय को भगा ले जाने को पुकारा और वह इस गाय को भगाकर शहर से दूर ले गया।

जब चौ० टेकाराम ने देखा कि सब कसाई उससे भयभीत होकर गाय को वापिस लाने का साहस छोड़ बैठे हैं, तब आप भी वहां से भागकर अपने गांव में आ गये।

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जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-1005

  1. इस घटना के कुछ समय पश्चात् वीर योद्धा टेकराम अपने कुछ साथियों को लेकर रोहतक के बूचड़खाने में घुस गए जहां पर कई कसाई गौओं तथा बछड़ों की हत्या करने ही वाले थे।

उन्होंने सब कसाइयों को मौत के घाट उतार दिया और सब गौओं तथा बछड़ों को वहां से निकाल लाए। ऐसी थी चौ० टेकराम की महान् वीरता।

  1. चौ० टेकराम ने अपने मित्र पहलवान लोटनसिंह अहलावत जो चिराग दिल्ली के निवासी थे, को दिल्ली के मुसलमान कसाइयों से गौओं को छुड़ाने हेतु युद्ध करने में कई बार सहायता दी। पहलवान लोटनसिंह अहलावत ने दिल्ली के कसाइयों को मार-मार कर इतना भयभीत कर दिया था कि उन्होंने पशुहत्या बंद कर दी। चौ० लोटनसिंह भी चौ० टेकराम की इस गोरक्षा सहायता के लिए रोहतक आते रहते थे।

चौ० टेकराम ने रोलट एक्ट के विरुद्ध हरयाणा में स्वाधीन विचारों का प्रसार किया। परिणामस्वरूप इन्हें सन् 1919 ई० में लाहौर किले में 3 वर्ष बन्दी रखा गया।

जब चौ० लालचन्द जी चौ० मातुराम को हराकर एम.एल.सी. बने तथा वजीर भी बनाए गए तब चौ० मातुराम ने चौ० लालचन्द के खिलाफ चुनाव याचिका दायर कर दी। ट्रिब्यूनल ने चौ० लालचन्द की सदस्यता खत्म कर दी, साथ ही उन्हें वजारत भी छोड़नी पड़ी।

उपचुनाव में चौ० मातुराम के मुकाबले में चौ० छोटूराम ने चौ० टेकराम को खड़ा किया। इस चुनाव में चौ० टेकराम भारी मतों से विजयी होकर एम.एल.सी बने।

दुर्भाग्य से अगस्त 1926 ई० में चौ० टेकराम को रोहतक में प्रेम निवास (सर छोटूराम की नीली कोठी) चौराहे पर उनके शत्रुओं ने कत्ल कर दिया।

वीर योद्धा चौ० टेकराम पर केवल हूडा गोत्र एवं जाट जाति को ही नहीं, बल्कि समस्त हिन्दू जाति को गर्व है। इनकी महानता सदा अमर रहेगी।

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