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क्या जाट कौम वास्तव में आजाद है?

जाटों के साथ पक्षपात के कुछ उदाहरण

क्या जाट कौम वास्तव में आजाद है?

इसका उत्तर विस्तार में ही दिया जा सकता है लेकिन फिर भी मैं इस लेख के द्वारा देने का प्रयास कर रहा हूं ।

कहने को देश हजारों साल की गुलामी झेलने के बाद 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ लेकिन वास्तव में यह सत्ता हस्तांतरण था जिसका प्रमाण है कि:

लार्ड माऊंट बेटन के कहने अनुसार आजादी का दिन 15 अगस्त 1947 को इसलिए निर्धारित किया कि इसी दिन 2 वर्ष पूर्व उसने फ्रंटियर का सुप्रीम कमांडर होते हुए 15 अगस्त 1945 को दूसरे विश्व युद्ध में जापान में एटम बम डलवाकर जापान और आई.एन.ए. को हथियार डालने के लिए मजबूर कर दिया था ।

इसलिए 15 अगस्त का दिन अंग्रेजों के लिए एक ‘विजय दिवस’ था । जब 15 अगस्त 1947 को सत्ता का हस्तांतरण हुआ जो अंग्रेजों की विजय की दूसरी सालगिरह थी और सत्ता सीधे तौर पर ब्राह्मण, बणिया और कायस्थ जातियों के हाथ आई ।

कुछ समय बाद पाकिस्तान से आने वाली अरोड़ा, खत्री और सिंधी जातियों ने अपनी दिमागी कसरत (साम, दाम, दण्ड, भेद) से इस सत्ता में अपनी भागीदारी बढ़ाई ।

प्रमाणस्वरूप यशपाल कपूर नेहरू के टाइपिस्ट थे तो आर.के. धवन इन्दिरा गांधी के टाईपिस्ट थे जो इसी नीति के कारण सांसद और केन्द्र में मंत्री तक बने जबकि इनका समाज सेवा व राजनीति से लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं था ।

इसके बाद कुछ जातियों ने अपनी जागरूकता के कारण समय आने पर सत्ता में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई । लेकिन उत्तर भारत की सबसे बड़ी ‘जाट कौम’ की इस सत्ता में कहीं कोई भागीदारी नहीं थी ।

किसान और जाट एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जिसकी पहचान उसकी अपनी किसानी, जमीन, गांव, जवान और सामाजिक व्यवस्था से ही रही है ।

जाट कौम का उस समय लगभग शत-प्रतिशत हिस्सा गांव में रहता था और आज 63 वर्षों बाद भी 90 प्रतिशत हिस्सा गांव में रहता है जबकि ऊपरलिखित छह सत्ता भोगी जातियों का 90 प्रतिशत हिस्सा शहरों में रहता है ।

देशवाल जाट गोत्र का इतिहास

क्या जाट कौम वास्तव में आजाद है
क्या जाट कौम वास्तव में आजाद है?

क्या जाट कौम वास्तव में आजाद है?

कहने का अर्थ एकदम विपरीत आंकड़े हैं जबकि इन छः जातियों की जनसंख्या पूरे भारत में मात्र 12 प्रतिशत है अर्थात् 12 प्रतिशत लोगों के पास इस देश की वास्तविक सत्ता है जो देश की बाकी 88 प्रतिशत जनसंख्या पर अपना राज करते हैं ।

हालांकि सन् 1950 में 10 देशों के संविधानों की नकल करके देश का संविधान बनाया गया लेकिन इस संविधान में कृषि प्रधान देश होते हुए भी गांव और कृषि के बारे में एक शब्द तक नहीं लिखा गया जबकि उस समय 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग गांव में रहकर कृषि पर आधारित थे ।

अंग्रेजों की नीति और कानून जो उन्होंने अपने हित में बनाए थे, को हूबहू समूचे देशवासियों पर लाद दिये गए जो सारे के सारे ‘किसान’ अर्थात् ‘जाट’ विरोधी थे और उसके बाद भी जो सुधार के नाम से परिवर्तन हुआ वह उससे भी अधिक जाट विरोधी रहा उदाहरण के लिए –

  1. अंग्रेजों की शहरीकरण नीति को आज तक जारी रखा गया है ताकि सभी सुविधाएं शहरों तक सीमित रहें और पूरे विकास की धुरी इन्हीं शहरों तक सीमित रहे जिस कारण ऊपरलिखित छः शहरी जातियों ने ही इसका लाभ उठाया और पूरे देश में यह संदेश गया कि जिन्होंने इनका लाभ उठाना है वे अपनी जन्मभूमि और अपना पुश्तैनी पेशा सभी छोड़कर अपनी ही जमीन पर शरणार्थी बनकर शहरों में अपना बसेरा करे।

इसी नीति के कारण आज तक 10 प्रतिशत जाटों को अपने घर-गांवों से बेघर होना पड़ा और पड़ रहा है अर्थात् परोक्ष रूप से उनको मजबूर किया गया जिसे किसी प्रकार से आजादी नहीं कहा जा सकता ।

जाटों के साथ पक्षपात के कुछ उदाहरण

  1. अंग्रेजों ने सन् 1894 में जमीन अधिकृत करने का कानून बनाया जो गुलाम देशवासियों के लिए बनाया गया था जिसमें सरकार को अपनी मर्जी से उसकी कीमत निर्धारित करके सरकार अपने आधीन करती है और वह जब चाहे अपनी मर्जी अनुसार मुआवजा देकर किसान को अपने पुश्तैनी पेशे से बेघर कर सकती है जिसमें किसान के बच्चों के पेशे की सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं ।

इसी कानून को सरकारों ने सन् 1947 के बाद भी उसी रूप में जारी रखा और सरकार ने उनके भावी पेशों की कोई जिम्मेदारी नहीं ली अर्थात् जाटों को उनकी जमीन के चंद पैसे देकर उनके पुश्तैनी पेशों से बेदखल करके सड़कों पर छोड़ दिया ।

वहीं अंग्रेजों का 1894 का कानून रहने के कारण देश का राज गौरे अंग्रेजों के हाथ से काले अंग्रेजों के हाथ आ गया । इसलिए चौ० छोटूराम ने कहा था – काले अंग्रेज गौरे अंग्रेजों से बुरे साबित होंगे। ओर यह हो रहा है ।

इस कानून के तहत जाटों को न तो अपनी जमीन की आजादी है और न ही उसकी कीमत की इसलिए जाट किसान को आजाद नहीं कहा जा सकता है ।

जाट भाइयों इस अंग्रेजों के कानून के तहत जो भी हमारी जमीन किसी भी सरकार ने किसी भी कीमत पर अधिग्रहित की है उसे वापिस लेना जाट कौम का धर्म और कर्म है ।

इसलिए आने वाले समय में अपने इस अधिकार के लिए तैयार हो जाओ । जैसे कि मेधा पाटेकर (ब्राह्मणी) अन्य लोगों के लिए जिनकी जमीन चली गई है, सत्याग्रह, आन्दोलन और मरणाव्रत तक रखती है लेकिन जाट किसानों के लिए उसने आज तक कोई बात नहीं कही । यही तो जाट कौम के खिलाफ इन तथाकथित समाज-सेवकों का दोगलापन है ।

  1. देश आजाद होते ही जमीन सरप्लस होने का कानून बनाया गया जिसमें 30 एकड़ से अधिक जमीन को सरप्लस माना गया जो एक सोचा और समझा षड्यन्त्र था क्योंकि इस सच्चाई को बिल्कुल नजर अंदाज कर दिया गया कि जाट किसान के चार या पांच पीढ़ी के बाद इनके बच्चों के पास कितनी जमीन शेष रह पाएगी । वर्तमान में मोदी सर्कार कानून लाइ है की कोई किसान अपनी जमीं ठेके या बंटाई पर देता व्यापार की श्रेणी में माना जायेगा जिसपर 18% जीएसटी लगेगी।

इसी के परिणामस्वरूप ऐसे जाटों के बच्चों को आज रोजी रोटी के लिए मोहताज होना पड़ रहा है जबकि दूसरी ओर आज तक किसी व्यापारी का कोई एक कारखाना या दुकान सरप्लस नहीं हो पाई ।

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क्या जाट कौम वास्तव में आजाद है?

इस प्रकार देश के अलग-अलग वर्गों के लिए अलग-अलग कानून बनते रहे और ऐसे कानून जाट विरोधी हैं जिसे किसी प्रकार से जाट किसान की आजादी नहीं कहा जा सकता है ।

  1. अंग्रेजों की दलाली और बिचौलिया नीति को अंग्रेजों ने अपनी सुविधा के लिए बनाया जिसे सन् 1947 के बाद और भी सुदृढ़ कर दिया गया जिसके परिणामस्वरूप अन्न व अन्य खाद्य उत्पादन करने वाले किसान व जाट किसान जो छः महीने तक तपती धूप और कड़कती ठंड में सिकुड़ते हुए संघर्ष करता रहा वह दरिद्रता की तरफ बढ़ता चला गया जबकि उसी उत्पादन की दलाली करने वाला मालामाल होता चला गया अर्थात् देश का सबसे बड़ा उत्पादक किसान अपनी छः महीने की कमाई की कभी भी कीमत वसूल नहीं कर पाया ।

उसी के परिणामस्वरूप हरित क्रान्ति की पूरी कमाई बिचौलिया और दलाल गटक गए और जाट किसान के हाथ में सरकारी कर्जा और आत्महत्या रह गए।

इसी कारण आज भी जाट किसान दलालों/ बिचौलियों व सरकार की रहमोकरम पर जिंदा है । इस प्रकार दूसरों के रहमोकरम पर जिंदा रहने वालों को आजाद किस प्रकार कहा जा सकता है ।

  1. जाट कौम सदियों से अपनी सुदृढ़ सामाजिक व्यवस्था के कारण अपने अस्तित्व को कायम रखती आई जिसमें गौत्रा प्रथा महत्त्वपूर्ण थी। गोत्रा की व्यवस्था तथा खाप co-related है। और इसी व्यवस्था के कारण अपने को सुरक्षित महसूस करती रही लेकिन फिर एक षड्यन्त्र के तहत सन् 1955 में ‘हिन्दू विवाह कानून के तहत समगोत्र विवाह की अनुमति देकर इस व्यवस्था को तोड़ने का प्रयास हुआ।

गोत्र व्यवस्था जाटों की रीढ़ है और जिसकी सुरक्षा के लिए जाटों ने अपने बच्चों का बलिदान तक देना पड़ रहा है जिसके विरोध में भारतवर्ष का समूचा मीडिया जाटों को तालिबानी स्थापित करने के लिए प्रयासरत है तथा साथ-साथ जाटों की छवि को धूमिल करने के लिए ‘ना आना इस देश लाडो’ जैसे टी.वी. सीरियल दिखाए जा रहे हैं।

क्या जाट कौम वास्तव में आजाद है
क्या जाट कौम वास्तव में आजाद है?

जाटों को लुटेरा लिखा गया जबकि ‘असली लूटेरों’ की कोई बात तक नहीं करता। यह सब नीति किसी गुलाम कौम के विपरीत ही बनाई जा सकती है इसलिए जाट कौम को किसी भी रूप में आजाद नहीं कहा जा सकता है।

  1. आज तक देश में जितने भी कानून बने हैं उन्हें किसी प्रकार से भी जाट हितैषी नहीं कहा जा सकता चाहे कोई बड़ा कानून हो या छोटा । जाटों का द्वितीय विश्वयुद्ध से राज राईफल्स, ग्रनेडियर्ज और आर्मड सेना में 40 प्रतिशत का आरक्षण था जो सन् 1998 में घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया अर्थात् जहां पांच हजार जाटों को रोजगार मिलता था, अभी आधा रह गया।

जाट कौम आरक्षण के लिए संविधान की धारा 340 के अनुसार आरक्षण की दोनों शर्तों को पूरा करती है लेकिन फिर भी जाट कौम को आरक्षण से बाहर रखा और उसके बाद जो भी दिया वह अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीके से दिया गया तथा कुछ राज्यों में जाटों को बिल्कुल ही छोड़ दिया गया।

इस प्रकार आरक्षण के मामले में सरकारों ने जाट कौम के साथ भेदभाव किया जो किसी गुलाम कौम के साथ किया जाता है । इसलिए जाटों को आजाद नहीं कहा जा सकता।

  1. देश को तथाकथित तौर पर आजाद होने के बाद वर्दी वाली सभी केन्द्र की सेवाओं में शारीरिक परीक्षण के अलग से अंक निर्धारित रहे जो किसी उम्मीदवार की मैरिट बनाने में बहुत बड़े सहायक थे।

जाट कौम एक कृषक और ग्रामीण होने के नाते सम्पूर्ण भारत में शारीरिक परीक्षण में सर्वोपरि रही है इसलिए उनके बच्चे शारीरिक परीक्षणों में उत्कृष्ट अंकों से सफल होते थे जो जान बूझकर सरकार ने ऐसे कानून बनाए जिसमें शारीरिक परीक्षणों के नम्बर हटा दिये गए जिससे कौम के रोजगार पर एक बहुत बड़ा धक्का लगा।

क्या जाट कौम वास्तव में आजाद है
क्या जाट कौम वास्तव में आजाद है?

इसी प्रकार केन्द्र ने अर्धसैनिक बलों आदि में जाट कौम उत्तर भारत की बलशाली कौम होने के कारण अच्छी खासी नफरी रहती थी लेकिन केन्द्र की सरकार की नीति के तहत इन नौकरियों में राज्यवार आरक्षण देकर उत्तर भारत की संख्या को घटाया गया जिसका सीधा असर जाट कौम के रोजगार पर पड़ा।

इस कारण ऐसे नियम और कानूनों को जाट विरोधी कहा जाएगा जो एक गुलाम के विपरीत लागू किए जाते हैं।

  1. इस प्रकार से अनेक सरकार की नीतियां और कानून हैं जो समस्त जाट विरोधी हैं । उदाहरण के लिए सन् 1991 से जाट किसानों को खाद आदि पर दी जाने वाली सब्सिडी को खत्म करके मिल-मालिकों के तहत दिए जाने का कानून बनाया जिसका लाभ मील मालिक गटक गए और किसान की लागत बढ़ती चली गई।

दोस्तों इस बढ़ती लागत के अनुपात में किसान के उत्पादन की कीमतें आधी भी नहीं बढ़ पाई परिणामस्वरूप जाट किसान गरीब से और गरीब होता चला गया।

अर्थात् सरकार ने अन्य उत्पादकों को मालामाल कर दिया और किसान जाट को गुलाम बना दिया गया । इसलिए जाट किसी भी दृष्टि से आजाद नहीं हैं।

  1. इसी प्रकार स्कूल के पाठ्यक्रमों में इतिहास विषय में राजपूत, मराठा आदि का इतिहास पढ़ाया जाता है लेकिन महाराजा सूरजमल व महाराजा रणजीत सिंह आदि का नाम तक नहीं है । अर्थात् पाठ्यक्रमों से जाट इतिहास नदारद है । इतिहास में केवल इतना ही लिखा कि जाट लूटेरे थे ।

इस प्रकार की नीति एक गुलाम समाज के प्रति ही अपनाई जा सकती है इसलिए जाट समाज को किसी भी प्रकार से आजाद नहीं कहा जा सकता।

जाटों की रियासतें
जाटों की रियासतें

सन् 1947 के बाद जाटों ने अपनी 26 रियासतों का भारत संघ में विलय इस विश्वास के साथ किया था कि भारत सरकार उनकी संस्कृति, पहचान, अधिकारों व इतिहास की सुरक्षा करेगी । लेकिन कहां है वह सुरक्षा? हमें इसका उत्तर चाहिए ।

आज हमारे खाने-पीने व मनोरंजन तक पर मनुवादियों ने पूरा कब्जा कर लिया है यहां तक कि धार्मिक कार्य भी इन्हीं अनुसार करते हैं । हमारी प्रत्येक गतिविधि इनके नियन्त्रण में है । यह अघोषित गुलामी है । इस सच्चाई को हमें स्वीकार करना होगा ।

हमारे जाट नेता वोट के लिए भीख के कटोरे लेकर दूसरी जातियों के सम्मेलनों में जाते हैं और हमारे वोटों को बंधक और गुलाम समझते हैं ।

इसी का उदाहरण है कि कल्पना चावला के नाम से मेडिकल कॉलेज बन रहा है जो विदेशी नागरिक थी और विदेश में ही मरी । जबकि कारगिल में देश के लिए मरने वालों के नाम शहीद मेडिकल कॉलेज नहीं रखा, यही तो इस गुलामी का दिवालियापन है।

अब प्रश्न पैदा होता है कि वर्तमान हालात में जहां पर लोकतन्त्र के नाम पर निजी स्वतन्त्रता के बहाने शहरों में रहने वाले किसी भी व्यापारी को मनमाने ढंग से लूट की जो पूरी आजादी प्राप्त है, उस अघोषित गुलामी से जाट कौम जो आज भी 90 प्रतिशत गांव में रहती है, वे संवैधानिक ढांचे में रहते हुए आजादी कैसे मिले ?

हमें जानना होगा कि चौ० छोटूराम की दोहरी मौत क्यों हुई ? पहले उनका स्थूल शरीर गया जो प्राकृतिक देन थी लेकिन उनकी विचारधारा को भी मारा गया और इसके हत्यारे कौन हैं?

हमें समझना होगा कि गुलामी क्या होती है? जो कौम आजाद नहीं उसे ही गुलाम कहा जाता है और गुलामी की परिभाषा विद्वानों ने अंग्रेजी में इस प्रकार है –

“Slavery does not merely mean a legalized form of subjection. It means a state of society in which some men are forced to accept from others the purpose which controls their conduct.”

अर्थात् ‘दासता का मतलब केवल राज्य का वैधता प्राप्त रूप ही नहीं है, इसका अर्थ समाज की वह स्थिति है जिसमें कुछ लोगों को दूसरे से ऐसे उद्देश्य लेकर अपनाने के लिए विवश कर दिया जाता है जो उनका व्यवहार नियंत्रित करते हैं ।

आज हमारे साथ भी यही हो रहा है कि हमें कानूनी तौर पर दूसरों की जीवन शैली अपनाने पर मजबूर किया जा रहा है । फिर हम आजाद कहां हैं ?

क्या जाट कौम वास्तव में आजाद है?

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